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Chipko Movement In Hindi Essay In Hindi

Chipko Andolan in Hindi

चिपको आंदोलन (Chipko Movement)

जब भी पर्यावरण संरक्षण (Environment Protection) की बात आती है, तो उत्तराखंड (Uttarakhand) के पर्वतीय क्षेत्र में 80 के दशक में चले एक अनूठे आन्दोलन ‘चिपको आंदोलन’ (Chipko Andolan) का जिक्र होना स्वाभाविक है। वन संरक्षण के इस अनूठे आंदोलन ने न सिर्फ देश भर में पर्यावरण के प्रति एक नई जागरूकता पैदा की बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘इको फेमिनिज़्म (Eco Feminism)’ या ‘नारीवादी पर्यावरणवाद’ का एक नया मुहावरा भी विकसित किया। उत्तराखण्ड राज्य का चिपको आन्दोलन एक घटना मात्र नहीं है। यह पर्यावरण व प्रकृति की रक्षा के लिए सतत चलने वाली एकप्रक्रिया है।

चिपको आन्दोलन का मतलब

चिपको आन्दोलन का अर्थ है कि पेड़ों को बचाने के लिये पेड़ों से चिपक कर जान दे देना, लेकिन पेड़ों को काटने नहीं देना।

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क्या है चिपको आंदोलन के पीछे की कहानी

भारत में पहली बार 1927 में ‘वन अधिनियम (वन अधिनियम 1927)’ को लागू किया गया था। इस अधिनियम के कई प्रावधान आदिवासी और जंगलों में रहने वाले लोगों के हितों के खिलाफ थे। ऐसी ही नीतियों के खिलाफ 1930 में टिहरी में एक बड़ी रैली का आयोजन किया गया था। अधिनियम के कई प्रावधानों के खिलाफ जो विरोध 1930 में शुरू हुआ था, वह 1970 में एक बड़े आंदोलन के रूप में सबके सामने आया जिसका नाम ‘चिपको आंदोलन’ रखा गया। 1970 से पहले  महात्मा गांधी के एक शिष्य सरला बेन ने 1961 में एक अभियान की शुरुआत की, इसके तहत उन्होंने लोगों को जागरुक करना शुरू किया। 30 मई 1968 में बड़ी संख्या में आदिवासी पुरुष और महिलाएं पर्यावरण संरक्षण के मुहिम के साथ जुड़ गए। इस प्रकार आगे चलकर इन्हीं छोटे-छोटे आंदोलनों से मिलकर एक विश्वव्यापी जनांदोलन की शुरुआत हुई।

चिपको आन्दोलन की शुरुआत

1974 में वन विभाग ने जोशीमठ के रैणी गाँव के क़रीब 680 हेक्टेयर जंगल ऋषिकेश के एक ठेकेदार को नीलाम कर दिया। इसके अंतर्गत जनवरी 1974 में रैंणी गांव के 2459 पेड़ों को चिन्हीत किया गया । 23 मार्च को रैंणी गांव में पेड़ों का कटान किये जाने के विरोध में गोपेश्वर में एक रैली का आयोजन हुआ, जिसमें गौरा देवी ने महिलाओं का नेतृत्व किया।

प्रशासन ने सड़क निर्माण के दौरान हुई क्षति का मुआवजा देने की तिथि 26 मार्च तय की गई, जिसे लेने के लिये सभी को चमोली आना था। इसी बीच वन विभाग ने सुनियोजित चाल के तहत जंगल काटने के लिये ठेकेदारों को निर्देशित कर दिया कि 26 मार्च को चूंकि गांव के सभी मर्द चमोली में रहेंगे और समाजिक कायकर्ताओं को वार्ता के बहाने गोपेश्वर बुला लिया जायेगा और आप मजदूरों को लेकर चुपचाप रैंणी चले जाओ और पेड़ों को काट डालो। इसी योजना पर अमल करते हुये श्रमिक रैंणी की ओर चल पड़े।  इस हलचल को एक लड़की द्वारा देख लिया गया और उसने तुरंत इससे गौरा देवी को अवगत कराया। पारिवारिक संकट झेलने वाली गौरा देवी पर आज एक सामूहिक उत्तरदायित्व आ पड़ा। गांव में उपस्थित 21 महिलाओं और कुछ बच्चों को लेकर वह जंगल की ओर चल पड़ी। ठेकेदार और जंगलात के आदमी उन्हें डराने-धमकाने लगे। लेकिन अपने साहस का प्रदर्शन करते हुए उन्होंने डटकर उनका सामना किया।  और उन्होंने गाँव की महिलाओं को गोलबंद किया और पेड़ों से चिपक गए। ठेकेदार व मजदूरो को इस विरोध का अंदाज़ न था। जब सैकड़ों की तादाद में उन्होंने महिलाओं को पेड़ों से चिपके देखा तो उनके होश उड़ गये। उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा और इस तरह यह विरोध चलता रहा।

उस समय अलकनंदा घाटी से उभरा चिपको का संदेश जल्दी ही दूसरे इलाकों में भी फैल गया। नैनीताल और अल्मोड़ा में आंदोलनकारियों ने जगह-जगह हो रहे जंगल की नीलामी को रोका।

टिहरी से ये आंदोलन सुन्दरलाल बहुगुणा के द्वारा शुरू किया गया, जिसमे उन्होंने गाँव-गाँव जाकर लोगो में जागरूकता लाने के लिये 1981 से 1983 तक लगभग 5000 कि.मी. लम्बी ट्रांस-हिमालय पदयात्रा की। और 1981 में हिमालयी क्षेत्रों में एक हज़ार मीटर से ऊपर के जंगल में कटाई पर पूरी पाबंदी की मांग लेकर आमरण अनशन पर बैठे। इसी तरह से कुमाँऊ और गढ़वाल के विभिन्न इलाकों में अलग-अलग समय पर चिपको की तर्ज पर आंदोलन होते रहे।

अंतत: सरकार ने एक समिति बनाई जिसकी सिफारिश पर इस क्षेत्र में जंगल काटने पर 20 सालों के लिये पाबंदी लगा दी गई।

वनों के महत्व को ध्यान में रखते हुए चिपको आंदोलन के मुख्य उद्देश्य रहे हैं-

  1. आर्थिक स्वावलम्बन के लिए वनों का व्यापारिक दोहन बंद किया जाए।
  2. प्राकृतिक संतुलन के लिए वृक्षारोपण के कार्यों को गति दी जाए।
  3. चिपको आंदोलन की स्थापना के पश्चात् चिपको आंदोलनकारियों द्वारा एक नारा दिया गया-

‘चिपको आन्दोलन’ का घोषवाक्य है-

क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार।
मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार।

सन 1987 में इस आन्दोलन को सम्यक जीविका पुरस्कार (Right Livelihood Award) से सम्मानित किया गया था।

आंदोलन का प्रभाव

इस आंदोलन की मुख्य उपलब्धि ये रही कि इसने केंद्रीय राजनीति के एजेंडे में पर्यावरण को एक सघन मुद्दा बना दिया जैसा कि चिपको के नेता रहे कुमाँऊ यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डॉ.शेखर पाठक कहते हैं, “1980 का वन संरक्षण अधिनियम और यहाँ तक कि केंद्र सरकार में पर्यावरण मंत्रालय का गठन भी चिपको की वजह से ही संभव हो पाया.”

उत्तर प्रदेश (वर्तमान उत्तराखण्ड) में इस आंदोलन ने 1980 में तब एक बड़ी जीत हासिल की, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने प्रदेश के हिमालयी वनों में वृक्षों की कटाई पर 15 वर्षों के लिए रोक लगा दी। बाद के वर्षों में यह आंदोलन पूर्व में बिहार, पश्चिम में राजस्थान, उत्तर में हिमाचल प्रदेश, दक्षिण में कर्नाटक और मध्य भारत में विंध्य तक फैला। उत्तर प्रदेश में प्रतिबंध के अलावा यह आंदोलन पश्चिमी घाट और विंध्य पर्वतमाला में वृक्षों की कटाई को रोकने में सफल रहा। साथ ही यह लोगों की आवश्यकताओं और पर्यावरण के प्रति अधिक सचेत प्राकृतिक संसाधन नीति के लिए दबाब बनाने में भी सफल रहा।

चिपको आंदोलन प्रारंभ में त्वरित आर्थिक लाभ का विरोध करने का एक सामान्य आंदोलन था किंतु बाद में इसे पर्यावरण सुरक्षा का तथा स्थाई अर्थव्यवस्था का एक अभिनव आंदोलन बना दिया। चिपको आंदोलन से पूर्व वनों का महत्व मुख्य रूप से वाणिज्यिक था। व्यापारिक दृष्टि से ही वनों का बड़े पैमाने पर दोहन किया जाता था। चिपको आंदोलनकारियों द्वारा वनों के पर्यावरणीय महत्व की जानकारी सामान्य जन तक पहुंचाई जाने लगी।

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नोट :-

  • चिपको आन्दोलन (Chipko Andolan) के सूत्रधार श्रीमती गौरा देवी (Smt. Gaura Devi) थी
  • इस आन्दोलन को शिखर तक पहुचने का काम पर्यावरणविद सुन्दरलाल बहुगुणा ने किया।
  • सन 1981 में सुन्दरलाल बहुगुणा को पद्मश्री पुरस्कार दिया गया लेकिन उन्होंने स्वीकार नहीं किया कि क्योंकि उन्होंने कहाँ जब तक पेड़ों की कटाई जारी है, मैं अपने को इस सम्मान के योग्य नहीं समझता हूँ।
  • इस आन्दोलन को 1987 में सम्यक जीविका पुरस्कार(Right Livelihood Award) से सम्मानित किया गया।

∗चिपको आन्दोलन∗

– Chipko Movement –

“पहले मुझे गोली मारो फिर काट लो हमारा मायका” – श्रीमती गौरा देवी.

मित्रों,

उत्तराखण्ड राज्य का चिपको आन्दोलन एक घटना मात्र नहीं है यह पर्यावरण व प्रकृति की रक्षा के लिए सतत चलने वाली प्रक्रिया है. ऐसे विस्तृत विषय के सभी पहलूओं को एक की पोस्ट में समाहित करना गागर में सागर भरने वाली बात है. मैनें तमाम रिसर्च व अनुभव को मिलाकर चिपको आन्दोलन का यह आलेख निम्न बिंदुओं में तैयार किया है :

  1. उत्तराखण्ड एक परिचय
  2. चिपको आन्दोलन का अर्थ एवं लक्ष्य
  3. चिपको आन्दोलन की भूमिका
  4. चिपको आन्दोलन एक सतत प्रक्रिया
  5. चिपको आन्दोलन की पृष्ठभूमि
  6. चिपको आन्दोलन 1974
  7. 26 मार्च 1974 पश्चात चिपको आन्दोलन का स्वरूप
  8. समाजसेवी सुन्दरलाल बहुगुणा का योगदान
  9. चंडी प्रसाद भट्ट – जीवन परिचय
  10. श्रीमती गौरा देवी – जीवन परिचय
  11. सुन्दरलाल बहुगुणा – जीवन परिचय

मुझे पूरा विश्वास है कि यह पोस्ट आपके लिये चिपको आन्दोलन के हर पहलू को को स्पष्ट करेगी.

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1. उत्तराखण्ड एक परिचय :

उत्तराखण्ड राज्य हिमालय का ही एक हिस्सा है. इसकी अंतर्राष्ट्रीय सीमा चीन से लगती है. पर्वतीय क्षेत्रों में जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण व कष्टदायक होता है. उत्तराखण्ड के लोगों की इस जीवन शैली ने ही उनमें संघर्ष की असीम क्षमता का निर्माण किया है. इसी के बलबूते पर यहाँ के लोगों ने अपने बुनियादी अधिकारों को लेकर अनेकानेक सफल जन आन्दोलन किये हैं. जिनमें 1921 का कुली बेगार आन्दोलन, 1930 का तिलाड़ी आन्दोलन, 1974 का चिपको आन्दोलन, 1984 का नशा नहीं रोजगार दो आन्दोलन तथा 1994 का उत्तराखण्ड राज्य प्राप्ति आन्दोलन विशेषरूप से उल्लेखनीय है.

2. चिपको आन्दोलन का अर्थ एवं लक्ष्य :

चिपको आन्दोलन का सांकेतिक अर्थ यही है कि पेड़ों को बचाने के लिये पेड़ों से चिपक कर जान दे देना, परन्तु पेड़ों को नहीं काटने देना है. अर्थात प्राणों की आहुति देकर भी पेड़ों की रक्षा करना है.

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3. चिपको आन्दोलन की भूमिका :

चिपको आन्दोलन की स्टोरी पर आने से पहले इसकी भूमिका को समझना और जनना जरुरी है. आज हम चिपको आन्दोलन की SAHISMAYBLOG पर जानकारी शेयर करने से पहले इसकी भूमिका के बारे में चर्चा कर लें. मैं एक वन अधिकारी होने के कारण इस आन्दोलन की स्टेज(स्थिति) क्यों आयी समझ सकता हूँ. उत्तराखण्ड राज्य के तीन जिलों उत्तरकाशी, चमोली व पित्थोरागढ़ की सीमा चीन से लगती है. चमोली तथा उसके आस पास के क्षेत्रों के लोगों की रोजी-रोटी के लिये व्यवसाय मवेशी पालन तथा लघु वन उपज – जड़ी-बूटी, गोंद, शहद, चारे के लिये घास फूस, कृषि सम्बन्धी छोटे-मोटे औजार बनाना आदि आदि था. 1962 तक तिब्बत व चीन के लोगों साथ यहाँ के निवासी ऊन तथा कुछ हथकरघा उद्योग की वस्तुओं इत्यादि का व्यापर करते थे. 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद परिस्थितियों में एकदम बदलाव आ गया. पहला बदलाव तो यह आया कि यहाँ लोगों का तिब्बत व चीन साथ व्यापर खत्म हो गया. इसके कारण यहाँ लोगों की आजीविका पूर्णतया वनों पर निर्भर हो गयी. दूसरा बदलाव यह आया कि सरकार को भारत चीन सीमा की सुरक्षा के लिये मार्गों का निर्माण करना पड़ा. इससे हिमालय में खड़ी अथाह वन सम्पदा सरकार, ठेकेदारों, माफियाओं की नजर में तथा पहुँच में आ गयी. हिमालय में पेड़ों की ठेकेदारी प्रथा (contractor system) से अंधाधुंध कटाई के साथ-साथ असुरक्षित खनन, सड़क निर्माण, जल विद्युत परियोजनायें व पर्यटन सहित अन्य विकास कार्यों से वनों का विनाश होना शरू हो गया. इतने असुरक्षित विकास कार्यों व वनों की अंधाधुंध कटाई को हिमालय झेल नहीं पाया और इन सबके परिणाम स्वरूप सन 1970 में ऐसी प्रलयंकारी बाढ आयी थी जैसी पिछले वर्ष 2013 में आयी. यह महाविनाश प्राकृतिक नहीं था. यह महाविनाश मानव निर्मित (Manmade Disaster) था. समस्त असुरक्षित विकास कार्यों व वनों की अंधाधुंध कटाई ने भूस्खलन व बाढ़ों का मार्ग प्रशस्त किया. यहाँ के निवासियों आजीविका तो दूर जीना मुश्किल हो गया था. मैं समझता हूँ, यहाँ तक पहुँचते-पहुँचते चिपको आन्दोलन होने की स्टेज आ चुकी थी.

4. चिपको आन्दोलन एक सतत प्रक्रिया :

चिपको आन्दोलन की एक समसामयिक आन्दोलन तक ही सीमितता नहीं है, यह एक सतत प्रक्रिया है. मित्रों, 2013 में केदानाथ, बद्रीनाथ व उत्तराखण्ड राज्य के अन्य हिस्सों में वर्षा से हुए महाविनाश के हम सब साक्षी हैं. इस महाविनाश का मुख्य कारण जैसा कि पहले वर्णित किया किया गया है कि हिमालय में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई तथा असुरक्षित खनन, सड़क निर्माण, जल विद्युत परियोजनायें व पर्यटन सहित अन्य विकास कार्यों से वनों का विनाश है. इतने असुरक्षित विकास को हिमालय झेल नहीं पाता और हमको ये विनाशलीलाएँ देखनी पड़ती है. कमोबेस इन्ही कारणों से यू.पी., बिहार व उत्तर पूर्वी राज्यों में हर साल बाढ़ों के कारण विनाश होता रहता है. दोस्तों, प्रकृति के प्रति असंवेदनशील घोटालेबाजों को घूस खाने, माफियाओं को मुनाफा कमाने, तथाकथित पर्दाफाशों को घोटाले उजागर कर पब्लिसिटी पाने तथा मीडिया को टी.आर.पी. बढ़ाने तक ही मतलब है. प्रकृति के विनाश की ओर किसी का ध्यान नहीं है. चिपको आन्दोलन एक सतत प्रक्रिया है. इसकी सार्थकता हमेशा बनी रहेगी. प्रकृति के संतुलन को आप जैसे प्रबुद्धजन व युवाशक्ति ही बचा सकती है. मैं यहाँ इस तथ्य को भी रेखांकित करना चाहूँगा कि पर्यावरण की रक्षा के लिये हुए आंदोलनों में मातृशक्ति का त्याग व योगदान उल्लेखनीय रहा है.मित्रों, मेरे द्वारा लिखी गयी पर्यावरण से संबंधित समस्त पोस्टस् के प्रति आप प्रबुद्ध जनों का उत्साह देखकर बहुत ही सुखद अनुभूति हुई. आपने पर्यावरण के प्रति जागरुकता व संवेदनशीलता की महती आवश्यकता को समझा है. इसीसे उत्साहित होकर मैंने यह पोस्ट तैयार की है. मैं इसको खेजड़ली बलिदान के बाद का यानि दूसरा चिपको आन्दोलन मानता हूँ. मेरी आपसे गुजारिश है कि इसी पोस्ट के नीचे दिये कमेन्ट बॉक्स में अपना विचार जरुर व्यक्त करें.

∗चिपको आन्दोलन∗

तीस साल बाद 2004 में गौरादेवी के जिवित साथी

चिपको आन्दोलन 1974 कह देने से इसकी स्टोरी श्रीमती गौरा देवी तक ही सिमित रह जाती है. श्री चंडी प्रसाद भट्ट व सुन्दरलाल बहुगुणा तथा अन्य लोगों का योगदान भी अमूल्य है. इस आन्दोलन के मुख्य संस्थापक श्री चंडी प्रसाद भट्ट हैं. इस आन्दोलन को श्रीमती गौरादेवी ने अमलीजामा दिया. चिपको आन्दोलन क्रियान्वित गौरादेवी की घटना से ही हुआ था. इसीलिये श्रीमती गौरादेवी को इस आन्दोलन की जननी तथा सूत्रधार कहा जाता है. इस आन्दोलन को विस्तार श्री सुन्दरलाल बहुगुणा ने दिया.

5. चिपको आन्दोलन की पृष्ठभूमि :

चंडी प्रसाद भट्ट का जन्म 23 जून 1934 को गोपेश्वर गांव (जिला चमौली) उत्तराखंड के एक गरीब परिवार में में हुआ था. इन्होंने चमौली से हाईस्कूल तक शिक्षा प्राप्त की. पर्वतीय क्षेत्र में रोजगार न मिलने के कारण इनको मैदानी क्षेत्र में ऋषिकेश आकर एक बस यूनियन के ऑफिस में क्लर्क की नौकरी करनी पड़ी. वहाँ भी इन्होंने बाहर की सवारियों से ज्यादा किराया वसूलने के वरोध सघर्ष शुरु कर दिया था.

1956 में सर्वोदयी नेता जयप्रकाश नारायण पीपलकोटी आये तब चंडी प्रसाद भट्ट ने उनका भाषण सुना तथा उनसे भेंट की. उसके बाद वे गांधीवादी समाजिक कार्यकर्ता बन गये. उन्होने सन् 1964 में गोपेश्वर में ‘दशोली ग्राम स्वराज्य संघ’ (दशोली गोपेश्वर के आस-पास के क्षेत्र की प्रशासनिक इकाई का नाम है) की स्थापना की, जो कालान्तर में चिपको आंदोलन की मातृ-संस्था बनी. इस संस्था ने स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों से रोजगार सृजित करने का काम शुरु किया. इसके साथ ही चंडी प्रसाद भट्ट, जयप्रकाश नारायण तथा विनोबा भावे को आदर्श बनाकर अपने क्षेत्र में श्रम की प्रतिष्ठा सामाजिक समरसता, नशाबंदी और महिलाओं-दलितों को सशक्तीकरण के द्वारा आगे बढ़ाने के काम में जुट गये.

स्थानीय रोजगार के मुख्य संसाधन वन ही थे. सोसायटी को छोटे फार्म टूल बनाने के लिये पेड़ों की जरुरत होती तब ये वन विभाग से मागते थे. परन्तु गलत सरकारी नीतियों के चलते वहाँ स्थानीय लोगों की मांग की पूर्ति न कर पेड़ साइमन जैसी बड़ी मैदानी कम्पनियों को ठेके पर दे देते थे. चंडी प्रसाद भट्ट के नेतृत्व में लगातार सरकारी नीतियों विरोध में लगातार संघर्ष चल रहे थे. 1970 में आयी प्रलयंकारी बाढ से उत्पन्न हुई भयावह परस्थितियों ने गलत सरकारी नीतियों के कारण हुए समस्त असुरक्षित विकास कार्यों व वनों की अंधाधुंध कटाई को उजागर कर दिया. उसके बाद चंडी प्रसाद भट्ट वनों का विनाश रोकने के लिए ग्रामवासियों को संगठित कर 1973 से चिपको आंदोलन आरंभ कर वनों का कटान रुकवाया. परन्तु चिपको आन्दोलन को वास्तविक सफलता व गति श्रीमती गौरादेवी की घटना के बाद मिली.

चिपको आन्दोलन की जननी श्रीमती गौरा देवी

6. चिपको आन्दोलन 1974 :

अब हम बात करने जा रहे हैं, 1974 में शुरु हुये विश्व विख्यात चिपको आन्दोलन की जननी, प्रणेता श्रीमती गौरा देवी जी की, जो चिपको वूमन के नाम से मशहूर हैं. 1925 में चमोली जिले के लाता गांव के एक मरछिया जनजाति परिवार में श्री नारायण सिंह के घर में इनका जन्म हुआ था. मात्र 12 साल की उम्र में इनका विवाह रैंणी गांव के मेहरबान सिंह से हुआ, रैंणी भोटिया (तोलछा) का स्थायी आवासीय गांव था, ये लोग अपनी गुजर-बसर के लिये पशुपालन, ऊनी कारोबार और खेती-बाड़ी किया करते थे. 22 वर्ष आयु में गौरा देवी पति का देहान्त हो गया था. तब उनका एकमात्र पुत्र चन्द्र सिंह मात्र ढाई साल का ही था. गौरा देवी ने ससुराल में रहकर छोटे बच्चे की परवरिश व वृद्ध सास-ससुर की सेवा के साथ-साथ खेती-बाड़ी व कारोबार को संभालने में अनेकानेक कष्टों का सामना करना पड़ा. उन्होंने अपने पुत्र को स्वालम्बी बनाया. उन दिनों भारत-तिब्बत व्यापार हुआ करता था, गौरा देवी ने उसके जरिये भी अपनी आजीविका का निर्वाह किया. 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद यह व्यापार बन्द हो गया तो चन्द्र सिंह ने ठेकेदारी, ऊन के धंधे तथा मजदूरी से आजीविका चलाई, इससे गौरा देवी आश्वस्त हुई और खाली समय में वह गांव के लोगों के सुख-दुःख में सहभागी होने लगीं. इसी बीच अलकनन्दा में 1970 में प्रलंयकारी बाढ़ आई, जिससे यहां के लोगों में बाढ़ के कारण और उसके उपाय के प्रति जागरुकता आयी.

इस कार्य के लिये प्रख्यात पर्यावरणविद श्री चण्डी प्रसाद भट्ट ने पहल की. इसी चेतना का प्रतिफल था, हर गांव में महिला मंगल दलों की स्थापना की. 1972 में गौरा देवी जी को रैंणी गांव की महिला मंगल दल का अध्यक्ष चुना गया. इसी दौरान वह चण्डी प्रसाद भट्ट, गोबिन्द सिंह रावत, वासवानन्द नौटियाल और हयात सिंह जैसे समाजिक कार्यकर्ताओं के सम्पर्क में आई. जनवरी 1974 में रैंणी गांव के 2451 पेड़ों का छपान हुआ. 23 मार्च को रैंणी गांव में पेड़ों का कटान किये जाने के विरोध में गोपेश्वर में एक रैली का आयोजन हुआ, जिसमें गौरा देवी ने महिलाओं का नेतृत्व किया. प्रशासन ने सड़क निर्माण के दौरान हुई क्षति का मुआवजा देने की तिथि 26 मार्च तय की गई, जिसे लेने के लिये सभी गाँव के सभी मर्दों को चमोली जाना था.

इसी बीच वन विभाग ने सुनियोजित चाल के तहत जंगल काटने वाले ठेकेदारों को निर्देशित कर दिया कि 26 मार्च को वे अपने मजदूरों को लाकर चुपचाप रैंणी जंगल के पेड़ों को काट कर ले जावें. गांव के सभी मर्द चमोली में रहेंगे उसी दिन समाजिक कायकर्ताओं को वार्ता के बहाने गोपेश्वर बुला लिया जायेगा. इसी योजना पर अमल करते हुये ठेकेदार श्रमिकों को लेकर रैंणी की ओर चल पड़े. वे रैंणी से पहले ही उतर कर ऋषिगंगा के किनारे रागा होते हुये रैंणी के देवदार के जंगलों को काटने के लिये चल पड़े. इस हलचल को एक छोटी लड़की ने देख लिया. उसने तुरंत इससे गौरा देवी को अवगत कराया. पारिवारिक संकटों को झुंझने वाली गौरा देवी पर आज एक सामूहिक उत्तरदायित्व आ पड़ा. वह गांव में उपस्थित 21 महिलाओं और कुछ बच्चों को लेकर वह जंगल की ओर चल पड़ी. इनमें बती देवी, महादेवी, भूसी देवी, नृत्यी देवी, लीलामती, उमा देवी, हरकी देवी, बाली देवी, पासा देवी, रुक्का देवी, रुपसा देवी, तिलाड़ी देवी, इन्द्रा देवी शामिल थीं. इनका नेतृत्व कर रही थी, गौरा देवी, इन्होंने खाना बना रहे मजदूरो से कहा ”भाइयो, यह जंगल हमारा मायका है, इससे हमें जड़ी-बूटी, फल- सब्जी और लकड़ी मिलती है, जंगल काटोगे तो बाढ़ आयेगी, हमारे बगड़ बह जायेंगे, आप लोग खाना खा लो और फिर हमारे साथ चलो, जब हमारे मर्द आ जायें तब फैसला कर लेंगें.” ठेकेदार और जंगलात के आदमी उन्हें डराने-धमकाने लगे, उन्हें बाधा डालने जुर्म में गिरफ्तार करने की भी धमकी दी, लेकिन यह महिलायें न डरी न झुकी. ठेकेदार ने बन्दूक निकालकर इन्हें धमकाया तो गौरा देवी ने अपनी छाती तानकर गरजते हुये कहा “पहले मुझे गोली मारो फिर काट लो हमारा मायका” इस पर मजदूर सहम गये. गौरा देवी के अदम्य साहस से इन महिलाओं में भी शक्ति का संचार हुआ और महिलायें पेड़ों के चिपक गई और कहा कि हमारे साथ इन पेड़ों को भी काट लो. ऋषिगंगा के तट पर नाले पर बना सीमेण्ट का एक पुल भी महिलाओं ने तोड़ डाला, जंगल के सभी मार्गों पर महिलायें तैतात हो गई. ठेकेदार के आदमियों ने गौरा देवी को डराने-धमकाने का प्रयास किया, यहां तक कि उनके ऊपर थूक तक दिया गया. लेकिन गौरा देवी ने नियंत्रण नहीं खोया और पूरी इच्छा शक्ति के साथ पूरी रात अपना विरोध जारी रखा. इससे मजदूर और ठेकेदार को आखिर हत्थियार डालने पड़े. इन महिलाओं की जीत हुई और जंगल बच गया.

इस घटना की चर्चा प्रदेश में ही नहीं बल्कि पूरे देश में जंगल में आग की तरह फ़ैल गयी. और इस आन्दोलन ने सरकार के साथ-साथ वन प्रेमियों और वैज्ञानिकों का ध्यान अपनी ओर खींचा. सरकार को इस हेतु डा० वीरेन्द्र कुमार की अध्यक्षता में एक जांच समिति का गठन किया. जांच के बाद पाया गया कि रैंणी के जंगल के साथ ही अलकनन्दा में बांई ओर मिलने वाली समस्त नदियों ऋषि गंगा, पाताल गंगा, गरुड़ गंगा, विरही और नन्दाकिनी के जल ग्रहण क्षेत्रों और कुवारी पर्वत के जंगलों की सुरक्षा पर्यावरणीय दृष्टि से बहुत आवश्यक है.

इस प्रकार से पर्यावरण के प्रति अतुलनीय प्रेम का प्रदर्शन करने और उसकी रक्षा के लिये अपनी जान तक की बाजी लगाने वाली गौरा देवी ने जो अनुकरणीय कार्य किया, उसने उन्हें रैंणी गांव की गौरा देवी से चिपको वूमेन ऑफ़ इण्डिया बना दिया.

श्रीमती गौरा देवी, पेड़ों के कटान को रोकने के साथ ही वृक्षारोपण के कार्यों में भी संलग्न रहीं, उन्होंने ऐसे कई कार्यक्रमों का नेतृत्व किया. आकाशवाणी नजीबाबाद के ग्रामीण कार्यक्रमों की सलाहकार समिति की भी वह सदस्य रही. सीमित ग्रामीण दायरे में जीवन यापन करने के बावजूद भी वह दूर की समझ रखती थीं. उनके विचार जनहितकारी हैं, जिसमें पर्यावरण की रक्षा का भाव निहित था, नारी उत्थान और सामाजिक जागरण के प्रति उनकी विशेष रुचि थी. श्रीमती गौरा देवी जंगलों से अपना रिश्ता बताते हुये कहतीं थीं कि “जंगल हमारे मैत (मायका) हैं” उन्हें दशौली ग्राम स्वराज्य मण्डल की तीस महिला मंगल दल की अध्यक्षाओं के साथ भारत सरकार ने वृक्षों की रक्षा के लिये 1986 में प्रथम वृक्ष मित्र पुरस्कार प्रदान किया गया. जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी द्वारा प्रदान किया गया था.

गौरा देवी ने ही अपने अदम्य साहस और दूरदर्शिता से चिपको आन्दोलन में प्राण फूंके. इसीलिये गौरा देवी को चिपको आन्दोलन की सूत्रधार व जननी कहा जाता है. इस महान व्यक्तित्व का निधन 4 जुलाई, 1991 को हुआ. यद्यपि आज गौरा देवी इस संसार में नहीं है, लेकिन उत्तराखण्ड ही हर महिला में वह अपने विचारों से विद्यमान है. हिमपुत्री की वनों की रक्षा की ललकार ने यह साबित कर दिया कि संगठित होकर महिलायें किसी भी कार्य को करने में सक्षम हो सकती है। जिसका ज्वलंत उदाहरण, चिपको आन्दोलन को अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त होना है.

7. 26 मार्च 1974 पश्चात चिपको आन्दोलन का स्वरूप :

 

चण्डी प्रसाद भट्ट ने रोजगार को लेकर अपने बुनियादी हक हकूकों के लिये 1964 में गांधीवादी तरीक़े से संघर्ष शुरु किया था. 1970 की बाढ़ के बाद यह संघर्ष अपने हक हकूकों के साथ-साथ स्थानीय सुरक्षा हेतु चिपको आन्दोलन में परिवर्तित हो गया था. 26 मार्च 1974 पश्चात चिपको आन्दोलन स्थानीय नहीं रह गया बल्कि एक ऐसी मुहिम में परिवर्तित हो गया जिसमें पूरे विश्व कल्याण की भावना निहित थी.

8. समाजसेवी सुन्दरलाल बहुगुणा का योगदान :

26 मार्च 1974 के गौरा देवी के साहसिक कदम ने सभी पर्यावरणविदों को आपस में जोड़ने कार्य भी किया. टिहरी गढवाल के समाजसेवी सुन्दरलाल बहुगुणा भी इस मुहीम में जुड़ गये. उन्होंने चिपको आंदोलन को विस्तार दिया और इस आन्दोलन को जल, जमीन व जंगल को जीवन की सुरक्षा से जोड़ दिया. और ‘चिपको आन्दोलन’ का घोषवाक्य बना –

क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार ।

मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार ।।

सुन्दरलाल बहुगुणा ने चिपको आन्दोलन से गाँव-गाँव जागरुकता लाने के लिये 1981 से 1983 तक लगभग 5000 कि.मी. लम्बी ट्रांस-हिमालय पदयात्रा की. ‘चिपको आन्दोलन’ का ही परिणाम था जो 1980 में वन संरक्षण अधिनियम बना और केंद्र सरकार को पर्यावरण मंत्रालय का गठन करना पड़ा. मित्रों, ‘चिपको आन्दोलन’ को कई सफलताएँ मिली. परन्तु प्रकृति का संतुलन बनाये रखने के लिये वन एवं वन्य जीवों का संरक्ष्ण एक सतत प्रक्रिया है. अत: ‘चिपको आन्दोलन’ की जरुरत हमेशा रहेगी. और यह सर्वथा समीचीन है.

9. चंडी प्रसाद भट्ट – जीवन परिचय

चंडी प्रसाद भट्ट /Chandi Prasad Bhatt

जीवन परिचय

नामChandi Prasad Bhatt / चंडी प्रसाद भट्ट
जन्म तिथि23 जून 1934.
जन्म स्थानगोपेश्वर गांव (जिला चमौली) उत्तराखंड.
माता-पितामहेशी देवी – गंगाराम भट्ट
निवासगोपेश्वर गांव (जिला चमौली) उत्तराखंड, India.
शिक्षाहाईस्कूल-चमौली
महत्वपूर्ण मोड़1956 में पीपलकोटी में जयप्रकाश नारायण से भेंट.
कार्यक्षेत्रसमाज सुधार
उपलब्धियांसहकारिता आधारित आन्दोलन के प्रारम्भकर्ता. दशौली ग्राम स्वराज्य मण्डल के संस्थापक. ‘चिपको आन्दोलन’ के सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्यकर्ता.1982 में रमन मैग्ससे पुरस्कार,1983 में अरकांसस (अमेरिका) अरकांसस ट्रैवलर्स सम्मान,1983 में लिटिल रॉक के मेयर द्वारा सम्मानिक नागरिक सम्मान,1986 में भारत के माननीय राष्ट्रपति महोदय द्वारा पद्मश्री सम्मान,1987 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम द्वारा ग्लोबल 500 सम्मान,   1997 में कैलिफोर्निया (अमेरिका) में प्रवासी भारतीयों द्वारा इंडियन फॉर कलेक्टिव एक्शन सम्मान,   2005 में पद्म भूषण सम्मान,   2008 में डॉक्टर ऑफ साईंस (मानद) उपाधि, गोविंद वल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर,   2010 रियल हिरोज लाईफटाईम एचीवमेंट अवार्ड सी.एन.एन. आई.बी.एन, -18 नेटवर्क तथा रिलाईंस इंडस्ट्रीज द्वारा सम्मान एवं पुरस्कार, 2013 का गाँधी शांति पुरस्कार(Gandhi Peace Prize) प्राप्त हुए हैं.
युवाओं को संदेशअन्याय का प्रतिकार करें. अपने परिवेश से कभी न कटें.

10. श्रीमती गौरा देवी – जीवन परिचय

श्रीमती गौरा देवी/ Gauradevi

 

जीवन परिचय

नामGauradevi / श्रीमती गौरा देवी
जन्म तिथि1925 (दिनांक ज्ञात नहीं).
जन्म स्थानलाता गांव के एक मरछिया परिवार में.
मृत्यु4 जुलाई, 1991 (aged 66)
मृत्यु स्थलरैंणी गांव.
निवासरैंणी गांव, Reni village, Hemwalghati, in Chamoli district, Uttarakhand, India.
कार्यक्षेत्रसमाज सुधार
उपलब्धियांचिपको आन्दोलन की सूत्रधार.

11. सुन्दरलाल बहुगुणा – जीवन परिचय

सुन्दरलाल बहुगुणा/Sunderlal Bahuguna

 

जीवन परिचय
नामSunderlal Bahuguna / सुन्दरलाल बहुगुणा
जन्म तिथि9 जनवरी 1927.
जन्म स्थानमरोड़ा, सिलयारा,टिहरी गढवाल, उत्तराखंड.
माता-पितापूर्णा देवी – अम्बादत्त बहुगुणा.
शिक्षाबी.ए. – सनातन धर्म कॉलेज लाहौर. एम.ए. – अपूर्ण काशी विद्यापीठ.
महत्वपूर्ण मोड़तेरह वर्ष की उम्र में श्रीदेव सुमन से मिलने पर स्वतंत्रता आन्दोलन का सिपाही बन गया.
निवासउत्तराखंड, India.
कार्यक्षेत्रसमाज सुधार
उपलब्धियांसुन्दरलाल बहुगुणा को सन 1981 में पद्मश्री पुरस्कार दिया गया जिसे उन्होंने यह कह कर स्वीकार नहीं किया कि “जब तक पेड़ों की कटाई जारी है, मैं अपने को इस सम्मान के योग्य नहीं समझता हूँ।“1985 में जमनालाल बजाज पुरस्कार।रचनात्मक कार्य के लिए सन 1986 में जमनालाल बजाज पुरस्कार,1987 में राइट लाइवलीहुड पुरस्कार (चिपको आंदोलन),1987 में शेर-ए-कश्मीर पुरस्कार   1987 में सरस्वती सम्मान   1989 सामाजिक विज्ञान के डॉक्टर की मानद उपाधि आईआईटी रुड़की द्वारा   1998 में पहल सम्मान   1999 में गाँधी सेवा सम्मान   2000 में सांसदों के फोरम द्वारा सत्यपाल मित्तल एवार्ड   सन 2001 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।

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Tags:Chandi Prasad Bhatt, Chipko andolan in hindi., Gauradevi, Sunderlal Bahuguna, गौरा देवी, चंडी प्रसाद भट्ट, सुन्दरलाल बहुगुणा

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Mahesh Choudhary

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